Thursday, 28 January 2021, 1:09 AM

कविता

चुनरी हरी उढानी है

Updated on 19 August, 2018, 7:00
विवेक रंजन श्रीवास्तव रोप पोस कर पौधे, अनगिन हरे भरे  अपनी जमीं को चूनर, हरी ओढ़ानी है होंगे संकल्प सारे हमारे फलीभूत हम प्रयास तो करें, सफलता आनी है  जब खरीदा, इक सिलेंडर आक्सीजन  तब  वृक्षों की कीमत उसने जानी है  जहाँ अंकुरण बीजों का है  संभव  ब्रम्हाण्ड में सारे , धरा यही वरदानी है  घाटियां गहराईयां , ऊँचाईयां... आगे पढ़े

Web Counter